Thursday, March 7, 2019

आइए, हम मर्द आज महिलाओं से माफ़ी तो मांगें: ब्लॉग

हम मर्द मानें या न मानें मुहिम ने तमाम औरतों को हौसला और आवाज़ दी है. शायद तभी वे शर्म और कलंक के डर से जीतकर ख़ामोशी तोड़ने में कामयाब हो पाईं. सालों से दफ़्न अपनी तकलीफ़ को सबके सामने सिर उठाकर खुलकर ज़ाहिर कर पाईं.

इस तक़लीफ़ को हम आज यौन हिंसा या यौन उत्‍पीड़न के नाम से जानते हैं. मौजूदा वक़्त में इस हिंसा और उत्‍पीड़न से लड़ने और बचने के लिए कई अलग-अलग क़ानून हैं.

इनमें से ज़्यादातर जब किसी न किसी रूप में हिंसा झेल रही थीं, तब ऐसा कुछ नहीं था. इस तक़लीफ़ के लिए न शब्‍द थे और न क़ानून. यह बहनापा भी नहीं था. ज़्यादातर महिलाएँ इसे चुपचाप झेलती थीं. 'मीटू' के तहत आवाज़ उठाने वाली लड़कियां क़ाबिलदिमाग़ और हुनरमंद हैं.

बहुत सारी बाधाएं पार कर वो मर्दों से घिरी काम की दुनिया में अपनी क़ाबिलियत की वजह से ही पहुंची. ज़ाहिर है, इनमें से कई लड़कियाँ अपने ख़ानदान, इलाके और गाँव-कस्‍बे की पहली स्‍त्री थीं या हैं, जिन्‍होंने बाहरी दुनिया में काम करने के लिए कदम बढ़ाया.

इसलिए इनके सामने ढेर सारी चुनौतियां भी थीं/हैं. हर तरह की 'इज्‍ज़त' बचाने का भार था/है. हालात बदले, माहौल बदला, 'इज्‍ज़त का तमगा' जब बोझ बन गया तो दफ़्न तक़लीफ़ों को ज़ुबान मिल गयी. नतीजा, एक के बाद एक आवाज़ निकलती चली गयी. साथ से साथ मिलता गया. बोलने का हौसला बनता गया. यही बहनापा है.

हालांकि आज शब्‍द हैं, क़ानून हैं, बहनापा है फिर भी स्त्रियों की तक़लीफ़ों यह सिलसिला रुका नहीं है. ऐसा भी नहीं है कि ये तक़लीफ़देह हालात शहरों के बड़े दफ़्तरों, कॉलेजों या विश्‍वविद्यालयों तक ही सीमित है.

गांव-कस्‍बों और खेतों में जहां भी मेहनतकश महिलाएँ हैं, वहाँ ये दिख सकता है.

आवाज़ उठाने वालियों की दास्‍तानें बता रही हैं कि तक़लीफ़ों की फेहरिस्‍त कितनी लम्‍बी है और कितने तरह की है. इस फेहरिस्त में तक़लीफ़ देने वाले अल्‍फाज़ हैं, तस्‍वीरें हैं, बात है, बर्ताव है, रवैया है, सुलूक है, मज़ाक है, जोर-ज़बरदस्‍ती है, ताक़त का इस्‍तेमाल है, धमकी है, सज़ा है, दिमाग़ी तनाव है, स्‍त्री को अपनी जरख़रीद जायदाद बनाने और मनमर्ज़ी के मुताबिक़ इस्‍तेमाल करने का लालच है, कुछ लाभ देने के बदले बहुत कुछ पाने की इच्‍छा है, स्‍त्री की काबिलियत को नकारने का सदियों पुराना गुरूर है, उसे महज़ एक देह तक समेट देने वाला चरित्र है... वाक़ई फेहरिस्‍त लम्‍बी है. सबको यहाँ समेट पाना या अल्‍फाज़ में पिरो पाना मुश्‍किल है.

ऐसा नहीं था कि 'मी टू' से पहले स्त्रियों के साथ होने वाले धौंस वाले मर्दाना बर्ताव के बारे में पता नहीं था. (यह धौंस वाला मर्दाना ज़िंदगी के हर क्षेत्र में देखा जा सकता है) मगर इसके साथ ख़ामोशी का एक लबादा था.

बहुत सी औरतें चाहकर भी बोलने की हिम्‍मत नहीं कर पाती थीं.

बहुतों ने मान लिया कि उनकी ज़िंदगी का यह सच है और इसी सच के साथ ज़िंदगी गुजारनी है. दफ़्तरों और विश्‍वविद्यालयों या ऐसी ही किसी जगह में कभी-कभार इक्‍का-दुक्‍का आवाज़ उठी तो उन आवाज़ को भी दबाने की हर मुमकिन कोशि‍श की गई.

कई बार ऐसा भी लगा कि यह तो निहायत ही मामूली सी बात है. इस पर शिकायत क्‍यों? मगर वह निहायत ही मामूली सी बात मर्दों के लिए थी/ है. वह उन लड़कियों और स्‍त्र‍ियों के लिए कभी मामूली नहीं थी/ है, जिन्‍होंने उन मर्दाना रवैये को झेला.

वे मामूली सी बातें तो उनके लिए जहन्‍नम की आग से गुजरने जैसा था/ है. वे जहन्‍नमी रवैये को अब और ख़ामोशी से बर्दाश्‍त करने को तैयार नहीं हैं. हम यह नहीं कह सकते कि वे अब क्‍यों बोल रही हैं. वे सही नहीं बोल रही हैं. वे बोल रही हैं, हमें उन्‍हें गौर से सुनना होगा. संवाद बनाना होगा. समझना होगा.

No comments:

Post a Comment

企业复工复产插上科技翅膀:万物上云,新业态层出不穷

  中新网客户端北京4月20日电(记者 吴涛)一 4月中旬, 色情性&肛交集合 全球多个疫苗团队 色情性&肛交集合 宣布取得进展的同时, 色情性&肛交集合 中国宣布第一波疫情已经得到控制, 色情性&肛交集合 中国在全球的新冠研究 色情性&肛交集合 的临床试验立项占比从 色情性&...